31 अगस्त 2019 - 13:53
क्या आप जानते हैं कि ईरान के दिवंगत राष्ट्रपति शहीद रजाई और प्रधानमंत्री बाहुनर एक ही साल पैदा हुए थे, एक ही साथ शहीद हुए और शहा

शहीद रजाई फुटपाथ पर सामान भी बेचते थे

आइये सबसे पहले हम आपको बहुत ही संक्षेप में शहीद रजाई की जीवनी से अवगत कराते हैं।

ईरान के दिगंगत राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई का 1312 हिजरी शमसी अर्थात (1933) में क़ज़वीन नगर में जन्म हुआ था। उनके दादा दिवंगत कर्बलाई अब्दुस्समद ख़र्राज़ी का सामान बेचते थे। वह इस प्रकार के धार्मिक व्यक्ति थे कि शाह की सरकार को अतिग्रहणकारी सरकार समझते थे और शाही सरकार के कर्मचारियों से लेन-देन को हराम समझते थे। यही नहीं जब कभी उन्हें शाही सरकार के कर्मचारियों के हाथ कुछ बेचने के लिए बाध्य होना पड़ता था तो सामान के बदले में शाह के कर्मचारी उन्हें जो पैसा देते थे उसे वह अलग रखते थे और शाही सरकार को टैक्स देने जैसे कार्यों में खर्च करते थे।  

शहीद रजाई की माता एक धर्मपरायण महिला थीं। 1316 हिजरी शमसी यानी 1937 में पति का निधन हो जाने के बाद शहीद रजाई का पालन- पोषण और प्रशिक्षा की ज़िम्मेदारी का निर्वाह उनकी मां ने किया।

धार्मिक मां ने अपने बेटे को भी धार्मिक बनाया और वह बचपन से मजलिस- मातम में बढ़चढकर भाग लेते थे। यही नहीं वह इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शोक सभाओं में नौहा भी पढ़ते थे।

बचपने में ही पिता का स्वर्गवास हो गया था या यूं कहूं कि बचपने में ही बाप की शफक़त के साये से महरूम हो गये थे। घर की आर्थिक दशा अच्छी नहीं थी इसलिए वह बचपने से पढ़ाई के साथ- साथ एक दुकान में काम भी करते थे।

खाली समय में वह इमाम ज़ादों और पवित्र धार्मिक स्थलों पर जाते थे और किराये पर साइकल लेकर चलाते थे और हर शुक्रवार को अपने पिता और परिवार के दूसरे सदस्यों की कब्र पर जाते थे।

1326 अर्थात 1947 में वह क़ज़वीन से तेहरान आ गये और अपनी मां के साथ किराये के घर में रहने लगे। सबसे पहले उन्होंने एक लोहार की दुकान में काम करना आरंभ किया। दुकान में काम करने से जो पैसा मिलता था उससे वह घर और स्कूल का खर्च चलाते थे। 

इसके कुछ दिन के बाद उन्होंने पुटपाथ पर सामान बेचना आरंभ कर दिया।

यह बात बहुत कही जाती है कि इंसान का दिन हमेशा एक जैसा नहीं रहता। शहीद रजाई के जीवन में नया मोड़ आया और समय ने करवट ली और वह 1328 अर्थात 1949 में वायु सेना में भर्ती हो गये और 5 वर्षों तक वायु सेना में रहने के बाद उन्होंने वायु सेना से त्यागपत्र दे दिया।

शहीद रजाई हमेशा धार्मिक सभाओं में भाग लेते थे यहां तक कि वह शाही सरकार के अत्याचारों से पूरी तरह अवगत हो चुके थे और शाह की अत्याचार सरकार से संघर्ष करने वालों की पंक्ति में शामिल हो गये।

वर्ष 1333 अर्थात 1954 में शहीद रजाई आयतुल्लाह तालेक़ानी के भाषणों व उपदेशों से प्रभावित होकर बीजार नगर चले गये और वहां अंग्रेजी पढ़ाने लगे पर कुछ समय बाद उन्होंने अंग्रेजी पढ़ाना छोड़ दिया और तेहरान वापस आ गये और अपनी पढ़ाई को जारी रखा।

1341 हिजरी शमसी अर्थात 1962 में शहीद रजाई ने विवाह किया और तेहरान के नार्मक क्षेत्र में अपना नया वैवाहिक जीवन आरंभ किया।

शहीद रजाई को हफ्ते में तीन दिन क़ज़वीन में पढ़ाना अनिवार्य होता था। 11 उर्दीबहिश्त 1342 अर्थात पहली मई 1963 को जब वह क़ज़वीन में बस से उतरे तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उनका सबसे बड़ा अपराध यह था कि वह शाह की अत्याचारी सरकार के खिलाफ चलाये जा रहे जनांदोलन से जुड़ गये थे।

48 दिनों तक जेल में रहने के बाद उन्हें इस शर्त के साथ छोड़ा गया कि भविष्य में वह दोबारा शाही सरकार के खिलाफ चल रहे जनांदोलन में शामिल नहीं होंगे।

शहीद रजाई को उसके बाद दोबारा गिरफ्तार करके जेल में बंद किया गया और कई 22 महीनों तक उन्हें अकेले सेल में रखा गया। वह जेल में अज़ान देते, नमाज़ पढ़ते और रोज़ा भी रखते थे।

शहीद रजाई की कुछ विशेषतायें इस प्रकार हैं

शहीद रजाई बहुत सादा जीवन गुज़ारते थे। वह अपने समय में तेहरान में गणित के अच्छे शिक्षकों में से एक थे।

ख़ाना बहुत कम खाते थे। कम से कम पर संतोष करते थे और अपने वेतन के एक भाग से अपने दोस्तों, निकटवर्तियों और निर्धन लोगों की सहायता करते थे।

विनम्र और सुशील स्वभाव के मालिक थे। ईरान की इस्लामी क्रांति के सफल होने के बाद और सफलता से पहले कभी भी वह विभिन्न प्रकार के खानों से सुसज्जित दस्तरख़ान पर नहीं बैठते थे। यही नहीं अगर कभी विवशतः बैठना भी पड़ जाता था तो वह एक ही प्रकार का खाना खाते थे।

रोचक बात यह है कि जब वह किसी को अपने यहां दावत देते थे तभी भी वह विभिन्न प्रकार के खानों का प्रबंध नहीं करते थे। इस प्रकार से वह दूसरों को सादा जीवन गुज़ारने का तरीक़ा सिखाते थे।

खाली समय में कमज़ोर छात्रों को फ्री में पढ़ाते थे। कम बोलते थे और जब बोलते थे तो बहुत नपे- तुले अंदाज़ में अपनी बात कहते थे। उनके घर में कुलर नहीं था। पूरी गर्मी कुलर के बिना गुज़रती थी। स्वर्गीय इमाम ख़ुमैनी से बहुत प्रेम करते थे।

शहीद रजाई की एक विशेषता यह थी कि जब कोई अपनी बात तर्क के साथ बयान करता था तो वह बहुत ही अच्छे अंदाज और खुले मन से उसे स्वीकार करते थे।

अब हम बहुत ही संक्षेप के साथ ईरान के दिवंगत प्रधानमंत्री मोहम्मद जवाद बाहुनर के जीवन के कुछ बिन्दुओं पर प्रकाश डालना चाहते हैं।

शहीद मोहम्मद जवाद बाहुनर भी 1312 अर्थात 1933 में किरमान नगर के एक बहुत पुराने मोहल्ले में पैदा हुए थे। शहीद बाहुनर अपने मां- बाप की दूसरी संतान थे और 9 भाई बहन थे। वह 5 वर्ष की आयु में मकतब गये और वहां उन्होंने पवित्र कुरआन पढ़ना सीखा। इसी तरह उन्होंने वहां फारसी भाषा के अलावा दूसरे विषयों की शिक्षा हासिल की।

मेहर 1332 अर्थात सितंबर 1953 में वह धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए किरमान से पवित्र नगर कुम आये। वहां कई वर्षों तक उन्होंने धार्मिक शिक्षा ग्रहण की यहां तक कि 35-36 साल की उम्र में उच्च धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के लिए इराक के पवित्र नगर नजफ का रुख किया। इराक से उच्च धार्मिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह स्वदेश लौट आये और शाह की तानाशाही सरकार के खिलाफ जनांदोलन से जुड़ गये जिसके कारण उन्हें कई बार गिरफ्तार करके जेल में डाल दिया गया।

बहरहाल इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद वह भी तेहरानी जनता की ओर से सांसद चुने गये, शिक्षा व प्रशिक्षा मंत्री बने और अंत में प्रधानमंत्री पद पर नियुक्त हुए।

स्वर्गीय इमाम खुमैनी शहीद रजाई और शहीद बाहुनर के बारे में कहते हैं” एसा नहीं है कि सत्ता और हुकूमत ने इन लोगों को प्रभावित कर दिया था बल्कि इन लोगों ने सत्ता को प्रभावित कर दिया था।“

बहरहाल 8 शहरीवर 1360 अर्थात 30 अगस्त 1981 को वह दिन आ गया जब प्रधानमंत्री कार्यालय में आतंकवादी गुट एमकेओ ने भीषण विस्फोट करके प्रधानमंत्री मोहम्मद जवाद बाहुनर और राष्ट्रपति मोहम्मद अली रजाई को शहीद कर दिया। जिस वक्त मोहम्मद जवाद बाहुनर और मोहम्मद अली रजाई शहीद हुए दोनों की उम्र 48-48 साल थी।

ईरान की इस्लामी क्रांति की सफलता के बाद शहीद रजाई शिक्षा व प्रशिक्षा मंत्री, प्रधानमंत्री और अंत में राष्ट्रपति बने।

ज्ञात रहे कि इससे ठीक दो महीना पहले भी एक भीषण आतंकवादी विस्फोट हुआ था जिसमें सैयद मोहम्मद हुसैनी बहिश्ती के अलावा 71 सांसद और राजनीतिक हस्तियां शहीद हुई थीं। यह भीषण विस्फोट भी एमकेओ ने किया था।रोचक बात यह है कि अमेरिका और ब्रिटेन जैसे मानवाधिकार की रक्षा का दम भरने वाले देशों, संगठनों और संस्थाओं ने न केवल इसकी भर्त्सना नहीं की बल्कि इस पर खेद तक नहीं जताया जबकि अगर पश्चिमी देशों में इस प्रकार का कोई आतंकवादी हमला होता तो ये देश न केवल उसकी निंदा करते बल्कि ज़मीन- आसमान एक कर देते और सुरक्षा परिषद की आपात काल बैठक भी बुलाते। यह है मानवाधिकारों की रक्षा का दम भरने वालों का असली चेहरा।